प्रसिद्ध पंडवानी गायिका और पद्म विभूषण से सम्मानित तीजन बाई का आज रायपुर के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) में निधन हो गया। उनके निधन से छत्तीसगढ़ सहित पूरे देश के कला जगत में शोक की लहर दौड़ गई है। तीजन बाई ने पंडवानी गायन शैली को अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहचान दिलाई और अपनी विशिष्ट शैली से लाखों श्रोताओं के दिलों पर राज किया।
Photo: cottonbro studio / Pexelsतीजन बाई का जन्म छत्तीसगढ़ के भिलाई के गनियारी गांव में हुआ था। उन्होंने पंडवानी की कपालिक शैली को अपनाया, जिसमें वे महाभारत की कहानियों को गाते हुए अभिनय भी करती थीं। उनकी शक्तिशाली आवाज और भावपूर्ण प्रस्तुति ने उन्हें अद्वितीय बना दिया। उन्होंने पारंपरिक पुरुष-प्रधान कला रूप में एक महिला के रूप में अपनी जगह बनाई और उसे नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया।
उनके निधन की खबर मिलते ही छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री और राज्यपाल सहित कई गणमान्य व्यक्तियों ने गहरा दुख व्यक्त किया। मुख्यमंत्री ने अपने शोक संदेश में कहा कि तीजन बाई का जाना कला और संस्कृति के क्षेत्र में एक अपूरणीय क्षति है। उन्होंने कहा कि तीजन बाई ने अपनी कला से छत्तीसगढ़ का नाम रोशन किया और वे हमेशा हमारी स्मृतियों में जीवित रहेंगी।
Photo: Alena Darmel / Pexelsतीजन बाई को पंडवानी कला के क्षेत्र में उनके असाधारण योगदान के लिए भारत सरकार द्वारा कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया था। उन्हें 1987 में पद्मश्री, 2003 में पद्म भूषण और 2019 में देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से नवाजा गया था। ये सम्मान उनकी कला और देश के प्रति उनकी सेवा का प्रमाण हैं।
उन्होंने न केवल भारत में बल्कि विदेशों में भी अपनी कला का प्रदर्शन किया। उनकी प्रस्तुतियां जापान, फ्रांस, जर्मनी, स्विट्जरलैंड और कई अन्य देशों में सराही गईं। उन्होंने पंडवानी को केवल एक क्षेत्रीय कला तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे वैश्विक पहचान दिलाई। उनके प्रदर्शनों ने विदेशी दर्शकों को भी भारतीय संस्कृति और महाभारत की कहानियों से परिचित कराया।
Photo: cottonbro studio / Pexelsतीजन बाई का जीवन संघर्षों और सफलताओं का एक प्रेरणादायक उदाहरण है। उन्होंने बचपन से ही पंडवानी सीखना शुरू कर दिया था, उस समय जब महिलाओं के लिए इस कला को सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत करना असामान्य था। उन्होंने सभी सामाजिक बाधाओं को पार करते हुए अपनी प्रतिभा और दृढ़ संकल्प के बल पर अपनी पहचान बनाई।
उनकी गायन शैली में महाभारत के पात्रों को जीवंत करने की अद्भुत क्षमता थी। वे अपनी प्रस्तुति के दौरान विभिन्न पात्रों की भूमिकाओं में ढल जाती थीं, जिससे दर्शक मंत्रमुग्ध हो जाते थे। उनकी प्रत्येक प्रस्तुति एक भावनात्मक अनुभव होती थी, जो दर्शकों को प्राचीन कथाओं की गहराई में ले जाती थी।
तीजन बाई ने युवा पीढ़ी के कलाकारों को भी पंडवानी सीखने और उसे आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कई शिष्यों को प्रशिक्षित किया और अपनी कला की विरासत को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका मानना था कि कला को जीवित रखने के लिए उसे नई पीढ़ियों तक पहुंचाना आवश्यक है।
उनके निधन से छत्तीसगढ़ की लोक कला और संस्कृति को भारी नुकसान हुआ है। हालांकि, उनकी विरासत और उनकी कला का प्रभाव हमेशा बना रहेगा। तीजन बाई को हमेशा एक ऐसी कलाकार के रूप में याद किया जाएगा जिन्होंने अपनी जड़ों से जुड़े रहते हुए भी वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बनाई।
उनके अंतिम संस्कार की तैयारियां की जा रही हैं और इसमें बड़ी संख्या में कला प्रेमी, राजनेता और आम जनता के शामिल होने की उम्मीद है। छत्तीसगढ़ सरकार ने उनके सम्मान में राजकीय शोक की घोषणा की है। यह उनके प्रति सम्मान और उनके योगदान की स्वीकृति है।
तीजन बाई का जीवन और कला एक प्रेरणा स्रोत बनी रहेगी। उन्होंने दिखाया कि कैसे दृढ़ संकल्प, प्रतिभा और कड़ी मेहनत से कोई भी व्यक्ति अपनी पहचान बना सकता है और अपनी संस्कृति को विश्व मंच पर गौरवान्वित कर सकता है। उनकी मधुर आवाज और शक्तिशाली प्रस्तुति हमेशा हमारे दिलों में गूंजती रहेगी।
पंडवानी के क्षेत्र में उनका योगदान अतुलनीय है। उन्होंने इस कला को एक नया आयाम दिया और इसे आधुनिक समय के दर्शकों के लिए भी प्रासंगिक बनाए रखा। उनकी मृत्यु एक युग का अंत है, लेकिन उनकी कला अमर रहेगी।
कला जगत के कई प्रमुख हस्तियों ने उनके निधन पर शोक व्यक्त किया है और उन्हें भारतीय लोक कला की एक महान प्रतिपादक बताया है। उन्होंने कहा कि तीजन बाई ने अपनी कला के माध्यम से भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को दुनिया के सामने प्रस्तुत किया।
आज, जब हम तीजन बाई को अंतिम विदाई दे रहे हैं, हम उनकी कला, उनके जुनून और उनके असाधारण जीवन को याद करते हैं। उनकी आत्मा को शांति मिले।