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भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है, जिसमें कहा गया है कि महिला वकीलों के लिए आवश्यक बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गरिमा के अधिकार का एक अभिन्न अंग है।
यह टिप्पणी एक याचिका की सुनवाई के दौरान की गई, जिसमें देश भर की अदालतों में महिला अधिवक्ताओं के लिए पर्याप्त सुविधाओं की कमी का मुद्दा उठाया गया था।Photo: Mark Stebnicki / Pexelsन्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि एक गरिमापूर्ण वातावरण में काम करना प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक अधिकार है, और इसमें कार्यस्थल पर आवश्यक सुविधाओं तक पहुंच शामिल है।
महिला वकीलों के लिए, विशेष रूप से शौचालय, विश्राम कक्ष और शिशु देखभाल सुविधाओं जैसी बुनियादी संरचनाओं की कमी उनके पेशेवर जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है और उनके गरिमापूर्ण अस्तित्व के अधिकार का उल्लंघन कर सकती है।शीर्ष अदालत ने विभिन्न राज्य सरकारों और बार काउंसिलों को इस मामले की गंभीरता को समझने और इस दिशा में ठोस कदम उठाने का निर्देश दिया।
न्यायालय ने कहा कि यह केवल सुविधा का मामला नहीं है, बल्कि न्याय तक पहुंच और कानूनी पेशे में लैंगिक समानता सुनिश्चित करने का भी एक महत्वपूर्ण पहलू है।अदालत ने स्वीकार किया कि कई अदालती परिसरों में, विशेषकर ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में, महिला वकीलों के लिए सुविधाओं की स्थिति चिंताजनक है।
इस स्थिति को सुधारने के लिए तत्काल ध्यान और संसाधनों के आवंटन की आवश्यकता है ताकि महिला अधिवक्ता बिना किसी बाधा के अपना काम कर सकें।यह निर्णय महिला वकीलों के लिए एक बड़ी राहत के रूप में देखा जा रहा है, और उम्मीद है कि यह देश भर की अदालतों में उनके लिए बेहतर कार्य वातावरण बनाने में मदद करेगा।