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बिलासपुर में बगैर किताबों के पढ़ाई: स्कूल खुलने के बाद भी नहीं पहुंची बुक, 70-80 GSM विवाद में फंसी बच्चों की शिक्षा

बिलासपुर जिले में शैक्षणिक सत्र शुरू हुए काफी समय हो चुका है, लेकिन सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले हजारों बच्चों को अभी तक किताबें नहीं मि...

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Author: Jagraj Published: 5 Jul 2026, 8:46 PM Updated: 7 Jul 2026, 6:46 PM Views: 1
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बिलासपुर जिले में शैक्षणिक सत्र शुरू हुए काफी समय हो चुका है, लेकिन सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले हजारों बच्चों को अभी तक किताबें नहीं मिल पाई हैं। यह स्थिति शिक्षा के अधिकार और बच्चों के भविष्य दोनों पर सवाल खड़े करती है। स्कूलों में उपस्थिति दर्ज हो रही है, शिक्षक पढ़ा रहे हैं, लेकिन छात्रों के हाथों में पाठ्यपुस्तकें न होने से पढ़ाई का माहौल अधूरा और अप्रभावी बना हुआ है।

Photo: Katerina Holmes / Pexels

यह समस्या केवल बिलासपुर तक सीमित नहीं है, बल्कि राज्य के कई अन्य जिलों में भी ऐसी ही स्थिति देखने को मिल रही है। अभिभावक और छात्र दोनों ही असमंजस में हैं कि बिना किताबों के वे कैसे पढ़ाई करें और आने वाली परीक्षाओं का सामना कैसे करें। शिक्षकों को भी बिना पाठ्यपुस्तकों के पढ़ाना एक चुनौती भरा काम लग रहा है, क्योंकि वे पाठ्यक्रम को सही ढंग से आगे नहीं बढ़ा पा रहे हैं।

पाठ्यपुस्तक वितरण में देरी का कारण: 70-80 GSM विवाद

इस गंभीर समस्या की जड़ में पाठ्यपुस्तकों के कागज़ की गुणवत्ता (GSM) को लेकर चल रहा विवाद है। जानकारी के अनुसार, राज्य सरकार और पुस्तक प्रकाशकों के बीच कागज़ के वजन और गुणवत्ता, विशेष रूप से 70-80 GSM के मानक को लेकर सहमति नहीं बन पा रही है। यह तकनीकी विवाद बच्चों की पढ़ाई पर भारी पड़ रहा है, क्योंकि जब तक यह मसला हल नहीं होता, तब तक किताबों का मुद्रण और वितरण रुका हुआ है।

Photo: Katerina Holmes / Pexels

राज्य शिक्षा विभाग और संबंधित आपूर्तिकर्ताओं के बीच यह गतिरोध कई हफ्तों से चला आ रहा है। जहां एक ओर विभाग गुणवत्ता मानकों पर कोई समझौता नहीं करना चाहता, वहीं दूसरी ओर आपूर्तिकर्ता लागत और अन्य व्यावसायिक पहलुओं का हवाला दे रहे हैं। इस खींचतान में सबसे ज्यादा नुकसान उन लाखों बच्चों का हो रहा है, जो अपने भविष्य को संवारने के लिए स्कूल जा रहे हैं।

बच्चों के भविष्य पर मंडराता संकट

बिना किताबों के पढ़ाई का मतलब है कि बच्चे न तो घर पर दोहराई कर पा रहे हैं और न ही कक्षा में शिक्षक के साथ प्रभावी ढंग से जुड़ पा रहे हैं। इससे उनकी समझ और सीखने की क्षमता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। प्राथमिक कक्षाओं के बच्चों के लिए तो यह स्थिति और भी गंभीर है, क्योंकि उन्हें अक्षरों और शब्दों की पहचान के लिए किताबों की सख्त जरूरत होती है।

Photo: Katerina Holmes / Pexels

विशेषज्ञों का मानना है कि शैक्षणिक सत्र की शुरुआत में ही किताबों का उपलब्ध न होना छात्रों के शैक्षणिक प्रदर्शन को बुरी तरह प्रभावित कर सकता है। इससे न केवल उनके सीखने की प्रक्रिया बाधित होगी, बल्कि उनमें स्कूल जाने के प्रति उत्साह भी कम हो सकता है। यह स्थिति ड्रॉपआउट रेट को भी बढ़ा सकती है, खासकर ग्रामीण और गरीब पृष्ठभूमि के बच्चों में।

अभिभावक संघों और विभिन्न सामाजिक संगठनों ने इस मुद्दे पर चिंता व्यक्त की है और सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। उनका कहना है कि बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं किया जाना चाहिए और इस विवाद को जल्द से जल्द सुलझाकर किताबों का वितरण सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

स्थानीय शिक्षा अधिकारियों ने भी स्वीकार किया है कि किताबों की अनुपलब्धता से पढ़ाई पर असर पड़ रहा है। उन्होंने बताया कि वे विभाग से लगातार संपर्क में हैं और उम्मीद कर रहे हैं कि जल्द ही इस समस्या का समाधान हो जाएगा। हालांकि, बच्चों और अभिभावकों का धैर्य अब जवाब देने लगा है।

यह घटनाक्रम राज्य में शिक्षा व्यवस्था की कमजोरियों को उजागर करता है। एक तरफ सरकार शिक्षा के क्षेत्र में सुधार के बड़े-बड़े दावे करती है, वहीं दूसरी तरफ बुनियादी स्तर पर ऐसी लापरवाहियां सामने आती हैं। यह सुनिश्चित करना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए कि हर बच्चे को समय पर और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले।

इस पूरे मामले में पारदर्शिता की कमी भी एक बड़ा मुद्दा है। जनता को यह जानने का अधिकार है कि पाठ्यपुस्तक वितरण में देरी का असली कारण क्या है और इसके लिए कौन जिम्मेदार है। जवाबदेही तय करना और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति को रोकना बेहद आवश्यक है।

आगामी दिनों में यदि यह समस्या बनी रहती है, तो छात्रों के लिए पाठ्यक्रम को पूरा करना और परीक्षाओं में अच्छा प्रदर्शन करना और भी मुश्किल हो जाएगा। सरकार को चाहिए कि वह इस GSM विवाद को तत्काल सुलझाए और युद्धस्तर पर किताबों का वितरण सुनिश्चित करे, ताकि बच्चों का भविष्य अंधकारमय न हो।

शिक्षाविदों का मानना है कि बिना पाठ्यपुस्तकों के शिक्षा एक खोखली प्रक्रिया है। किताबें न केवल ज्ञान का स्रोत होती हैं, बल्कि वे छात्रों में स्व-अध्ययन की आदत भी विकसित करती हैं। इस मूलभूत आवश्यकता की पूर्ति में देरी बच्चों के सीखने की प्रक्रिया को गंभीर रूप से बाधित कर रही है।

यह देखना होगा कि राज्य सरकार और संबंधित विभाग इस गंभीर स्थिति से निपटने के लिए क्या कदम उठाते हैं। बच्चों के शैक्षणिक भविष्य को दांव पर लगाना किसी भी समाज के लिए स्वीकार्य नहीं हो सकता। शीघ्र ही इस समस्या का समाधान निकालना ही एकमात्र विकल्प है।

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Staff Reporter at VG Khabar.

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