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Chhattisgarh

बिलासपुर में शिक्षा की बदहाली: पीपल पेड़ के नीचे चल रहा सरकारी स्कूल, बच्चों का नाम कटवाने को मजबूर पैरेंट्स

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले से शिक्षा व्यवस्था की एक बेहद चिंताजनक तस्वीर सामने आई है, जहां एक सरकारी स्कूल भवन के अभाव में पीपल के पेड़ क...

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Author: Jagraj Published: 3 Jul 2026, 4:49 PM Updated: 3 Jul 2026, 10:32 PM Views: 2
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छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले से शिक्षा व्यवस्था की एक बेहद चिंताजनक तस्वीर सामने आई है, जहां एक सरकारी स्कूल भवन के अभाव में पीपल के पेड़ के नीचे संचालित हो रहा है। यह स्थिति न केवल छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ है, बल्कि शिक्षा के अधिकार का भी खुला उल्लंघन है। इस दयनीय स्थिति के कारण कई अभिभावक अपने बच्चों का नाम स्कूल से कटवाने को मजबूर हो रहे हैं, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा की पहुंच और गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

Photo: Quang Nguyen Vinh / Pexels

मामला बिलासपुर के एक सुदूर गांव का है, जहां प्राथमिक विद्यालय के बच्चों को खुले आसमान के नीचे पीपल के पेड़ की छांव में बैठकर पढ़ाई करनी पड़ रही है। स्कूल भवन न होने के कारण गर्मी, बारिश और ठंड जैसी मौसमी परिस्थितियों का सीधा असर बच्चों की पढ़ाई पर पड़ रहा है। बारिश के दिनों में तो स्कूल पूरी तरह बंद ही करना पड़ता है, जिससे बच्चों की पढ़ाई का भारी नुकसान होता है। यह स्थिति ग्रामीण भारत में शिक्षा के बुनियादी ढांचे की कमी को उजागर करती है।

अभिभावकों का कहना है कि उन्होंने कई बार स्थानीय प्रशासन और शिक्षा विभाग के अधिकारियों से स्कूल भवन के निर्माण की गुहार लगाई है, लेकिन उनकी सुनवाई नहीं हुई। थक-हारकर अब वे अपने बच्चों के भविष्य को लेकर चिंतित हैं और उन्हें मजबूरन किसी अन्य स्कूल में दाखिला दिलवाने या पढ़ाई छुड़वाने पर विचार कर रहे हैं। यह स्थिति उन गरीब परिवारों के लिए और भी दुखद है जो निजी स्कूलों का महंगा खर्च वहन नहीं कर सकते।

Photo: Gustavo Fring / Pexels

इस घटना ने शिक्षा के अधिकार अधिनियम (RTE) के प्रभावी क्रियान्वयन पर भी प्रश्नचिह्न लगा दिया है, जो 6 से 14 वर्ष की आयु के प्रत्येक बच्चे को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार देता है। अधिनियम के तहत प्रत्येक स्कूल को न्यूनतम बुनियादी सुविधाएं प्रदान करना अनिवार्य है, जिसमें सुरक्षित और उपयुक्त भवन भी शामिल है। पीपल के पेड़ के नीचे स्कूल का संचालन स्पष्ट रूप से इन मानदंडों का उल्लंघन है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की परिस्थितियां बच्चों के सीखने के माहौल को बुरी तरह प्रभावित करती हैं। खुले में पढ़ाई करने से उनका ध्यान भंग होता है, वे मौसमी बीमारियों की चपेट में आते हैं और शिक्षा के प्रति उनकी रुचि भी कम हो सकती है। इसके अलावा, यह बच्चों में स्कूल छोड़ने की दर को बढ़ाने में भी योगदान दे सकता है, खासकर लड़कियों के लिए, जिनके माता-पिता सुरक्षा कारणों से उन्हें स्कूल भेजने से कतरा सकते हैं।

Photo: Arie Rachmat / Pexels

बिलासपुर जिला प्रशासन को इस मामले पर तत्काल ध्यान देने और स्थायी समाधान खोजने की आवश्यकता है। केवल एक स्कूल भवन का निर्माण ही इस समस्या का एकमात्र हल नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी महत्वपूर्ण है कि ऐसे सभी सरकारी स्कूल, जो बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं, उन्हें प्राथमिकता के आधार पर अपग्रेड किया जाए। शिक्षा विभाग को ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूलों के बुनियादी ढांचे की नियमित निगरानी करनी चाहिए।

यह घटना सिर्फ बिलासपुर की नहीं है, बल्कि देश के कई ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में शिक्षा की बदहाली का प्रतीक है। शिक्षा के क्षेत्र में पर्याप्त निवेश और प्रभावी नीतियों के बिना, भारत अपने जनसांख्यिकीय लाभांश का पूरी तरह से लाभ नहीं उठा पाएगा। बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करना न केवल उनका अधिकार है, बल्कि राष्ट्र के भविष्य के लिए भी एक महत्वपूर्ण निवेश है।

स्थानीय जनप्रतिनिधियों और गैर-सरकारी संगठनों से भी यह अपेक्षा की जाती है कि वे इस मुद्दे को उठाएं और प्रशासन पर दबाव बनाएं ताकि बच्चों को एक सुरक्षित और सम्मानजनक शैक्षणिक वातावरण मिल सके। शिक्षा के बिना कोई भी समाज प्रगति नहीं कर सकता, और इस तरह की स्थिति को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।

शिक्षा के अधिकार का उल्लंघन और भविष्य पर असर

शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009, भारत में बच्चों के लिए एक मील का पत्थर साबित हुआ है, लेकिन बिलासपुर की यह घटना दर्शाती है कि इस अधिनियम के प्रावधानों को जमीनी स्तर पर लागू करने में अभी भी कितनी चुनौतियाँ हैं। एक सुरक्षित और प्रेरक सीखने का माहौल प्रदान करना शिक्षा की नींव है, और जब यह नींव ही कमजोर हो, तो बच्चों के शैक्षणिक प्रदर्शन और उनके समग्र विकास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है।

खुले में पढ़ाई करने से बच्चों को न केवल शारीरिक discomfort होता है, बल्कि मानसिक रूप से भी वे असुरक्षित महसूस कर सकते हैं। धूल, शोर और मौसम के उतार-चढ़ाव के बीच एकाग्रता बनाए रखना बेहद मुश्किल होता है। ऐसे में, बच्चों की सीखने की क्षमता प्रभावित होती है और वे अपनी पूरी क्षमता का प्रदर्शन नहीं कर पाते। यह स्थिति उनके भविष्य की संभावनाओं को सीमित कर सकती है और उन्हें गरीबी के दुष्चक्र में फंसाए रख सकती है।

अभिभावकों द्वारा बच्चों का नाम कटवाने का निर्णय एक गंभीर संकेत है कि वे वर्तमान शिक्षा प्रणाली में विश्वास खो रहे हैं। जब माता-पिता अपने बच्चों को शिक्षा से वंचित करने पर मजबूर होते हैं, तो यह सरकारी शिक्षा प्रणाली की विफलता को दर्शाता है। सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि प्रत्येक बच्चे को, चाहे वह किसी भी पृष्ठभूमि से आता हो, गुणवत्तापूर्ण और सुलभ शिक्षा मिले।

इस समस्या का समाधान केवल तात्कालिक नहीं होना चाहिए, बल्कि दीर्घकालिक योजना के तहत होना चाहिए। इसमें न केवल स्कूल भवनों का निर्माण शामिल है, बल्कि शिक्षकों की पर्याप्त उपलब्धता, शिक्षण सामग्री और अन्य बुनियादी सुविधाओं का प्रावधान भी शामिल है। शिक्षा में निवेश को व्यय के बजाय भविष्य के लिए एक महत्वपूर्ण निवेश के रूप में देखा जाना चाहिए।

यह घटना राज्य सरकार और केंद्र सरकार दोनों के लिए एक वेक-अप कॉल है कि शिक्षा के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने और ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने के लिए और अधिक प्रयास किए जाएं। केवल कागजों पर योजनाएं बनाने से नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर उनके प्रभावी क्रियान्वयन से ही भारत एक शिक्षित और सशक्त राष्ट्र बन पाएगा।

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Jagraj

Staff Reporter at VG Khabar.

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